mere gwalior ki pehchan sangeet samrat tansen se hai,. unki yaad main tansen samaroh bhi hota hai. iske baad saal me ek baar mela bhi lagta hai. ise 100 se jyada ho gaye. ab ye gwalior ki branding ke liye gwalior carnival shuru kiya hai. is carnival ke brand ambesdor milind gunaji hai. iski opening karne haizal keech aati hai. chambal show me dakoo nachte hai. kya ye mere gwalior ki pehchan hai ? sawal to ye hai ki, kya gwalior ki zameen se koi aisa naam nahi paida huaa jo iska brand ambesedor ban pata ? ya iska openning geet sagar jaisa apne hi gwalior ka beta karta. itna hi nahi daku dekh kar kya bahar ke log mere gwl se prabhavit honge ? in sabke baad sabse bada sawal ise starheen aayojan me prashasan ke afsar din raat ek kar denge ? aakhir kis liye ? ye kaun log hai jo sanstha ki shakal me gwalior carnival kar ke iski pahchan badalne me lage hai. is aayojan ki funding bhi kaun si takate kar rahi hai. jinke aage prashasan aur rajneta sir jhuka ke aur haath bandh ke khade hai. ISKE JIMMEDAR AAP AUR HUM HAI, JO GWALIOR KA CHEER HARAN DEKH KAR BHI CHUP HAI.
मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं.
मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं मगर उनसे पूछ कर देखिये जिन्हे मैंने बिन सोचे समझे जाने क्या क्या कहा है!
मैं जैसा खुद को देखता हूं, शायद मैं वैसा नहीं हूं.......
कभी कभी थोड़ा सा चालाक और कभी बहुत भोला भी...
कभी थोड़ा क्रूर और कभी थोड़ा भावुक भी....
मैं एक बहुत आम इन्सान हूं जिसके कुछ सपने हैं...कुछ टूटे हैं और बहुत से पूरे भी हुए हैं...पर मैं भी एक आम आदमी की तरह् अपनी ज़िन्दगी से सन्तुष्ट नही हूं...
मुझे लगता है कि मैं नास्तिक भी हूं थोड़ा सा...थोड़ा सा विद्रोही...परम्परायें तोड़ना चाहता हूं ...और कभी कभी थोड़ा डरता भी हूं...
मुझे खुद से बातें करना पसंद है और दीवारों से भी...
बहुत से और लोगों की तरह मुझे भी लगता है कि मैं बहुत अकेला हूं...
मैं बहुत मजबूत हूं और बहुत कमजोर भी...
लोग कहते हैं लड़कों को नहीं रोना चाहिये...पर मैं रोता भी हूं...और मुझे इस पर गर्व है क्योंकि मैं कुछ ज्यादा महसूस करता हूं...
Thursday, 13 June 2013
फायर ब्रिगेड मंगवा दे तू अंगारों पर है अरमान
ऊपर लिखी इन पंक्तियों के मायने बहुत है . देश की मोजुद हालत भी यही बयां कर रही है. हर तरफ दामिनी की मौत पर अंगार भड़क भड़क जा रहे है? इसके के लिए जिम्मेदार कांग्रेस, देश की सरकार या फिर और कौन ? जिम्मेदार आप है, और हा अपनी गलती छुपाने के लिए जज की भूमिका में मत आइये. स्वीकार करे आप अब तक गलत थे, और इन हालातो के बाद आत्म मंथन जरुर करेंगे.
१६ दिसम्बर की घटना के बाद लिखने का काफी दिल था. इस घटना के आखिर कौन जिम्मेदार है इस सही मायने में तय नहीं कर पा रहा था. काफी सोचने के बाद लगा की हालत इस स्तर तक आने के लिए मैं और आप सबसे बड़े दोषी है. अब अनुमान लगाये की ही वारदात को अंजाम देने वाले लोग कहा से आये है. शीला दिक्षित के घर से, कांग्रेस कार्यालय से या पाकिस्तान से. घटना के बाद हम सजा देने अपने ही देश के पुलिस वालो को क्यों चुन रहे है. आखिर पुलिस वालो के भी परिवार और बेटिया है. इसके बाद घटना के बाद दिल्ली के जंतर मंतर और इंडिया गेट पर प्रदर्शन का क्या औचित्य है ? इस आन्दोलन की शुरुआत हमे अपने घरो से करना होगी . अब यहाँ बात शुरुआत से करूँगा, ऊपर लिखी पंक्ति फायर ब्रिगेड मंगवा दे तू.......... इसके विडियो को देख कर मायने समझे जा सकते है. कितने घरो में ये गाना सुबह टीवी ओन होते ही शुरू हो जाता है. पुरुषो के अंडरवियर के विगयापन में लड़की को अर्धनग्न दिखाया जाता है. फिर जलेबी बाई, और चिकनी चमेली और न जाने क्या क्या.....इसमें महिला को मानव जाती की बजै कोई विलासता और उपभोग की वास्तु की तरह पेश किया जाता है. अब रोज सुबह टीवी ओन होते ही जलेबी बाई और फायर ब्रिगेड के रूप में कोई लड़की अर्धनग्न स्क्रीन पर दिखेगी, तो मानसिकता दूषित होना जायज है. यदि विरोध करना है तो देश के सेंसर बोर्ड , आइटम गर्ल मल्लिका अरोरा, मल्लिका शेरावत और क्लौडिया के घर पर प्रदर्शन होने चाहिए. जो आज दिल्ली की घटना से व्यथित है उन्हें यह सन्देश जरी करना होगा की अब कही भी महिला वर्ग को उपभोग की वास्तु की तरह पेश न किया जाये. दामिनी की मौत इस देश में कम से कम नारी समाज को सही सम्मान देने में कामयाब रही तो यह उसकी शहादत समझी जाएगी. दरअसल लिखना बहुत है, पर दिमाग चल रही उथल पुथल को मैं सही शब्द नही दे पा रहा हु. इसलिए थोडा लिखा है, पर ज्यादा समझिएगा.
- आपका , अर्पण राउत, ग्वालियर 474002
१६ दिसम्बर की घटना के बाद लिखने का काफी दिल था. इस घटना के आखिर कौन जिम्मेदार है इस सही मायने में तय नहीं कर पा रहा था. काफी सोचने के बाद लगा की हालत इस स्तर तक आने के लिए मैं और आप सबसे बड़े दोषी है. अब अनुमान लगाये की ही वारदात को अंजाम देने वाले लोग कहा से आये है. शीला दिक्षित के घर से, कांग्रेस कार्यालय से या पाकिस्तान से. घटना के बाद हम सजा देने अपने ही देश के पुलिस वालो को क्यों चुन रहे है. आखिर पुलिस वालो के भी परिवार और बेटिया है. इसके बाद घटना के बाद दिल्ली के जंतर मंतर और इंडिया गेट पर प्रदर्शन का क्या औचित्य है ? इस आन्दोलन की शुरुआत हमे अपने घरो से करना होगी . अब यहाँ बात शुरुआत से करूँगा, ऊपर लिखी पंक्ति फायर ब्रिगेड मंगवा दे तू.......... इसके विडियो को देख कर मायने समझे जा सकते है. कितने घरो में ये गाना सुबह टीवी ओन होते ही शुरू हो जाता है. पुरुषो के अंडरवियर के विगयापन में लड़की को अर्धनग्न दिखाया जाता है. फिर जलेबी बाई, और चिकनी चमेली और न जाने क्या क्या.....इसमें महिला को मानव जाती की बजै कोई विलासता और उपभोग की वास्तु की तरह पेश किया जाता है. अब रोज सुबह टीवी ओन होते ही जलेबी बाई और फायर ब्रिगेड के रूप में कोई लड़की अर्धनग्न स्क्रीन पर दिखेगी, तो मानसिकता दूषित होना जायज है. यदि विरोध करना है तो देश के सेंसर बोर्ड , आइटम गर्ल मल्लिका अरोरा, मल्लिका शेरावत और क्लौडिया के घर पर प्रदर्शन होने चाहिए. जो आज दिल्ली की घटना से व्यथित है उन्हें यह सन्देश जरी करना होगा की अब कही भी महिला वर्ग को उपभोग की वास्तु की तरह पेश न किया जाये. दामिनी की मौत इस देश में कम से कम नारी समाज को सही सम्मान देने में कामयाब रही तो यह उसकी शहादत समझी जाएगी. दरअसल लिखना बहुत है, पर दिमाग चल रही उथल पुथल को मैं सही शब्द नही दे पा रहा हु. इसलिए थोडा लिखा है, पर ज्यादा समझिएगा.
- आपका , अर्पण राउत, ग्वालियर 474002
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कल ग्वलियर मे राजनैतिक महौल गरमा गया। आरएसएस के नेता मोहन भागवत का पुतला फूंकने िनिकले मुट्टठी भर यूथ कांग्रेस के नेताओं को खासा विरोध पुलिस का झेलना पड़ा। पुलिस ने उनसे पुतला तो छीन ही िलिया। साथ ही इस दौरान महिला नेत्री सुश्री रश्मि पर भी पुलिस ने हाथ उठा िदिया। इतना ही नही, अचानक प्रकट हुए बजरंगियों ने भी कांग्रेसियों को खदेड़ने में कोई कसर नही छोड़ी। इस पूरे एपिसोड में कांग्रेस की गुटबाजी अपने चरम पर दिखी। इस आयोजन में युंका की प्रदेश उपाध्यक्ष का साथ देने के िलिए अकेले लोकसभा क्षेत्र अध्यक्ष केदार ही संघषर् करते नजर आए। जबकि पूरी पाटीर् ने उनसे िकिनारा कर लिया। कांग्रेस में वैसे भी गुटबाजी की परंपरा पुरानी रही है।
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हालात पैदा करेंगे विभीषण
ग्वालियर के व्यापार मेले में तीन दिनों तक लगे भगवा मेले में 10 साल से ताजा कमल इस जेठ की गर्मी में मुरझाने का संकेत दे गया। पार्टी पर इस बार भारी विभिषण ही बैठेंगे। (यहां नाम न लेना ठीक रहेगा) दरअसल पार्टी में कभी सिरमौर रहे करंटबाज नेता अब हाशिए पर है। उन्हे भारी गमजा इस बात का है कि वह हमेशा से सादगी से रहे, और उस पर से अपने पट्ठों को भी जमकर तवज्जों दी। इसके बाद भी पार्टी ने एन चुनाव के पहले उन्हे हाथ पकड़ कर प्रदेश में हस्तक्षेप करने से रोक दिया। भगवा मेले में उन्हे दिन और रात कार्यकर्ताओं के बीच देखा गया। जबकि मुंह में तंबाकू का घिस्सा रखकर हमेशा सिर हिलाकर जवाब देने वाले नेता कहां से और कहां जाते थे, ये किसी को पता नही चला। दूसरी और राजनीति के लिए अपना जीवन होम करने वाली साध्वी को पूर्व मुख्यमंत्री के नाते बुलाया तक नही गया। उस पर राजनाथ कह गए कि आपसी व्देश में पूरे घर को आग ना लगा दें। अब अपन से पूछों तो बताएं हकीककत कि अब आग लगी तो पानी डालने वाला भी नही मिलेगा। आखिर पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी तीन दिन शौच धोने के लिए पानी का इंतजाम किसी नेता ने नही किया था।
भस्मासुर के बाप का खुलासा -
एनआईए की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि चार कांग्रेसी नेता नक्सलियों के संपर्क में थे। अब जरा गौर फरमाइएगा कि इन नेताओं की मौत से फायदा किसे था। हाल ही में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस वोट बैंक को द्रवित कर अपने पास खींचना चाहती है या कांग्रेस के ही पिछले पंकि्त के नेता आगे आने की जुगत में है। खैर, काबिल ए गौर ये भी होगा कि आखिर इन नक्सलाइट को पोस कौन ताकते रही है। इन नेताओं को यह सोचना भी जरुरी होगा कि उनके तैयार नक्सलवाद और आतंकवाद जैसे भस्मासुर अब कहीं आगे इन पर ही हाथ ना रख दें। भगवान शिव तो अपनी क्षमताओं से भस्मासुर से छुटकारा पा लिए थे। अब इऩका क्या होगा कालिया.....
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